करेला उगाने की पूरी जानकारी


 कहते है जो फल या सब्जी खाने में जितनी अधिक कड़वी होती है। वह स्वास्थ के लिये उतनी ही अधिक फायदेमंद होती है।करेला एक बहुत ही फायदेमंद सब्जी है। करेला की सब्जी ज्यादातर लोगों को पसन्द है।करेला दो मौसम गर्मी और बरसात में आसानी से उगाया जा सकता है। आज हम आपको करेले को गमले में उगाने की पूरी जानकारी देने वाले है।

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करेला (bitter gourd ) उगाने का सही समय - 
करेला थोड़ा गर्म मौसम का पौधा है। उत्तर भारत में फरवरी-मार्च में से  करेला उगाया जाता है। आप फरवरी से लेकर जून जुलाई के महीने तक करेले को लगा सकते हैं।जितनी जल्दी करेले को लगा देगें उतना अच्छा पोधा बनेगा

गर्मी के मौसम मे- फरवरी- मार्च मेें बीज लगायें
बरसात के मौसम में - जून -जुुुुलाई के महीने में 

करेले का सही बीज - 
दोनों मौसम ( गर्मी बरसात) में उगाया जाने वाला करेले का बीज अलग अलग होता है। गर्मियों के मौसम के लिए अलग और बरसात के मौसम के लिए करेले का बीज अलग वैरायटी का लेना चाहिए। आप में से बहुत सारे लोग गर्मियों के मौसम के करेले के बीज को ही बरसात के मौसम में लगा देते हैं जो कि बिल्कुल गलत है। गर्मियों के सीजन का बीज बरसाती मौसम में लगाने पर करेले के पौधे पर अच्छे करेले नहीं आते उनका आकार बड़ा नही होता।  साथ ही साथ छोटे - छोटे करेले पीले होकर सड़ जाते हैं।

1- गमले में करेले को उगाने के लिए हमेशा हाइब्रिड वैरायटी का करेले का बीज प्रयोग करना चाहिए। आप अपने नजदीकी बाजार में खाद बीज की दुकान पर जाकर करेले के संकर किस्म ( hybrid seeds) की वैरायटी का बीज खरीद कर ला सकते हैं। इसके अलावा आप ऑनलाइन बाजार से भी करेले की अच्छी प्रजाति के बीज मंगा कर बगीचे में लगा सकते हैं। 
2- दो तरह के करेले के बीज आते है। देशी करेला और संकर या हाईब्रिड  करेला।





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देशी करेला - (Desi karela)
आकार में देसी करेला छोटा होता है लेकिन खाने में बहुत ही स्वादिष्ट और रोगों से लड़ने में हमारी काफी मदद करता है देसी करेले के पौधे पर छोटे-छोटे लेकिन अधिक संख्या में फल आते हैं देसी करेले के पौधों पर बीमारियों का कम प्रकोप होता है करेले को कम पानी की आवश्यकता भी होती है।

हाइब्रिड  करेला - ( hybreed bitter gourd )
 हाइब्रिड करेला का पौधा तेजी से बड़ा होता है हाइब्रिड करेले के पौधे पर बड़े आकार के फल आते हैं और उनके संख्या भी ज्यादा होती है। खेती में किसान लोग हाइब्रिड करेले के बीजों का प्रयोग करते हैं ।हाइब्रिड करेला आकार में बड़ा होने के साथ-साथ हरे रंग का होता है।जो दिखने में भी अच्छा लगता है। लेकिन देसी करेले के मुकाबले स्वाद में कम अच्छा होता है। अगर आप पहली बार करेला उगा रहे हैं तो हाइब्रिड वैरायटी के करेले  का बीज जरूर लगाएं क्योंकि हाइब्रिड बीज से उगाये  करेले के पौधे पर बहुत जल्दी करेले का फल आता है। हाइब्रिड करेले के बीज थोड़े महंगे आते हैं।

यह ना करें - 
करेला या अन्य सब्जियां उगाते समय यह बात आपको जरूर ध्यान रखने वाली है कि बाजार या सब्जी मंडी में जब आप जाते है तो वहां पर आपको पकी सब्जियां मिल जाती हैं जैसे करेला, बैगन, खीरा ,मिर्च आदि है तो आप क्या करते हैं कि बाजार की जो यह पकी सब्जियां हैं उन्हीं के बीज निकालकर बगीचे में उगा देते हैं। दोस्तो ध्यान रखिये बाजार की सब्जियों द्वारा उगाए गए पौधों पर ना तो अच्छे फल आएंगे और ना ही उनका साइज बड़ा होगा। क्योंकि बाजार में जो सब्जियां आती हैं वह हाइब्रिड बीजों से उगाई जाती हैं
 और हाइब्रिड बीज से तैयार सब्जियों के बीजों को जब आप दोबारा उगाते तो उन बीजों से उगे पौधों पर अच्छी सब्जियां नहीं आएगी । हाइब्रिड सब्जियों के बीज प्रयोगशाला में ही तैयार किए जाते हैं और सिर्फ एक बार ही उन्हें उगाया जा सकता हैं दोबारा बीज लगाने के लिए आपको नए बीजों को खरीदना पड़ेगा।
करेले के लिये गमले का आकार  -
करेला एक लता वाली सब्जी है। करेला उगानए के लिए बड़े गमले की जरूरत होती है। घर पर या घर की छत पर करेला लगाने के लिए आपको 12 इंच या उससे बड़े गमले का प्रयोग करना चाहिए। किसी बड़े बाथटब या ग्रो बैग का प्रयोग भी करेला उगाने के लिए कर सकते हैं ।करेला उगाने के लिए जितना बड़ा गमला होगा उतना ही अच्छा करेले का पौधा तैयार होगा और उस पर ज्यादा संख्या में करेले के फल आएंगे। 
करेले के लिये गमला - 12" या उससे बड़ा गमला
 गमले में करेला लगाते समय ध्यान रखें कि गमला ऐसा होना चाहिए जो लंबे समय तक खराब ना हो और उसमें अतिरिक्त पानी निकलने के लिए ज्यादा से ज्यादा छेद भी होने चाहिए। करेले के पौधे को कम पानी की आवश्यकता होती है अधिक पानी होने पर करेले का पौधा खराब हो जाता है।


करेले के लिये मौसम -

 करेले को गर्म मौसम पसंद आता है ।उत्तर भारत में बात की जाए तो फरवरी से लेकर अक्टूबर तक करेले को उगाया जाता है ।करेला एक बेलदार सब्जी है जिसे तेज धूप और कम पानी की आवश्यकता होती है।करेले के गमले में ज्यादा पानी होने पर करेले के पौधे की पत्तियां पीली पड़ने लगती है
बारिश के मौसमें लगातार बारिश होने पर करेले के फल पीले होकर सड़ जाते हैं। गमले में लगे करेले के पौधे को पांच 7 घंटे की तेज धूप मिलनी चाहिए। पानी आवश्यकता के अनुरूप देना होता है। गमले में मिट्टी गीली होने पर करेले के पौधे में पानी ना दें।

धूप - 5-7  घन्टे 
पानी - कम पानी की जरूरत होती है। दो तीन दिन में एक बार पानी दें। 

करेले के लिये मिट्टी - 
करेले को अधिक उर्वरक लेकिन रेतीली मिट्टी पसन्द है। ऐसी मिट्टी जिसमें पानी स्टोर ना हो। इसके लिये आप जब भी मिट्टी तैयार  करें तो रेत मिक्स कर लें जिससे मिट्टी भुरभुरी तैयार हो।

बगीचे की मिट्टी - 50%
खाद -             -30%
रेत (sand)     -20%

करेला कैसे लगायें - 
 करेले को आप सीधे सीधे बीज से भी उगा सकते हैं । या बीज से पहले पौधा तैयार करें और उसके बाद जहां आप को करेला लगाना है वहां पर पहले से तैयार पौधे को रोपित कर दें। मिट्टी में बीज लगाने से पहले बीज को 1 दिन पानी में भिगो लेना चाहिए। जिससे करेले का बीज आसानी से अंकुरित हो जाये। करेले के पौधे को दीमक बहुत जल्दी खराब करती है तो बीज लगाने से पहले बीज को उपचारित कर लें या मिट्टी में नीम खली मिला लें जिससे करेले का पौधा तैयार होने पर उस में दीमक का प्रकोप ना हो।

करेले के लिये खाद
करेला या अन्य जितनी भी सब्जियां आप घर की छत पर उगा रहे हैं। इन सब्जियों में जैविक या प्राकृतिक खाद का प्रयोग करें। जैसे गोबर खाद, वर्मी कंपोस्ट या कंपोस्ट खाद। प्राकृतिक खाद हमारे स्वास्थ्य के लिए तो फायदेमंद होती ही हैं यह पौधों के लिए भी किसी वरदान से कम नहीं है जैविक खाद का प्रयोग करने से गमले की मिट्टी खराब नहीं होती है और उसमें पोषक तत्व भी लंबे समय तक बने रहते हैं । जिससे हमारे पौधे तेज ग्रोथ करते है। रासायनिक खाद का प्रयोग सब्जीयों या फलदार पौधों में भूलकर भी ना करें।  रासायनिक खाद का लगातार प्रयोग करने से मिट्टी की संरचना बदल जाती है जिसमें पौधों का उचित विकास नहीं हो पाता । रासायनिक खाद द्वारा उगाए गए फल या सब्जियां हमारे स्वास्थ्य के लिए भी हानिकारक होती हैं।

खाद की मात्रा - 12" गमले के लिये 100-150 ग्राम गोबर खाद महीने मेें दो बार
वर्मी कम्पोस्ट- 100 ग्राम खाद महीने में दो बार दे सकते है।

खाद देने का तरीका -
करेले के पौधे में खाद देने के लिए आपको कुछ बातें ध्यान रखनी है। करेले में जब भी खाद देनी हो तो गमले में  दो-तीन दिन पहले पानी देना बंद कर दीजिए। करेले के गमले की मिट्टी जब ड्राई हो जाए उसके बाद मिट्टी की गहरी गुड़ाई करें फिर दो घन्टे मिट्टी को धूप लगने दें। इसके बाद 100 -150 ग्राम गोबर खाद मिट्टी में मिला कर ऊपर से गमले की सिंचाई कर दें और पौधे को धूप में रख दें।
गमले में लगे करेले की देखरेख 
■ करेले को हमेशा बड़े गमले में ही उगायें। छोटा गमला होने पर करेले का पौधा और फल पीले पड़ कर खराब हो जाते है। 12" या उससे बड़ा गमला प्रयोग  करना चाहिये।

■ करेला लगे गमले को ऐसी जगह रखें जहां पर अधिक समय तक तेज धूप आती हो। सप्ताह में एक बार गमले को घुमा दीजिये जिससे पौधे का पूरा भाग सूरज की तरफ बना रहे।

■ करेले के लिये अधिक पानी जहर के समान है। इसलिये गमले में से अतिरिक्त पानी निकलने के लिये वाटर ड्रेनेज होल अधिक संख्या में होने चाहिये। करेले में अधिक सिंचाई नही करनी चाहिये। जब तक गमले की मिट्टी सूख ना जाये तब तक पानी नही देना चाहिये।

■ 12" के गमले में करेले का एक या दो पौधा ही लगाना चाहिये। पौधे को सपोर्ट देने के लिये लकङी या रस्सी की सहायता से कोई ढांचा बना देना चाहिये। 

■ करेले में ज्यादा खाद ना दें ।अधिक खाद देने पर करेले में लीफ कर्ल रोग की संभावना बन जाती है। पौधा अधिक खाद से खराब हो जाता है।

■ करेले के पौधे में बहुत अधिक शाखाए भी ना निकलने दें। अधिक शाखा (branch) होने पर करेले पर फलों का साइज छोटा हो जाता है। और पौधे की उम्र भी कम हो जाती है।

■ करेले के गमले की गुड़ाई करते समय ध्यान रखें कि मुख्य तने के पास गुड़ाई ना करें। क्योंकि करेले की सहायक जड़े ऊपर ही अधिक होती है।गुड़ाई करते समय यह जड़े कट ना जाये इस बात का विशेष ध्यान रखें।
Karela पर आने वाले रोग -
1- मुरोड़िया रोग (leaf curl)
पत्तियों का मुड़ोरिया(leaf curl)  रोग करेले के पौधे पर इस रोग का बहुत बड़ी संख्या में प्रकोप होता है। मौसम में अचानक से बदलाव होने पर वायरस द्वारा इस रोग को फैलाया जाता है। एक बार इस रोग का प्रकोप होने पर पौधा बहुत तेजी से खराब हो जाता है। इस रोग में पौधे की पत्तियां मुड़ कर छोटी रह जाती हैं। फिर धीरे-धीरे पीली पढ़कर खराब होने लगती हैं । एक बार पत्तियों के खराब होने पर पौधा भोजन नहीं बनाता था और कुछ समय बाद पीला पढ़कर सूख जाता है।

रोकथाम -
Leaf curl रोग की रोकथाम के लिए किसी अच्छी कंपनी के फंगीसाइड दवा का प्रयोग करें। फंगीसाइड दवा लगभग एक लीटर पानी में 2 ग्राम पाउडर मिलाकर सप्ताह में दो बार सुबह शाम पौधे पर दवा का छिड़काव करें । आप घर पर छाछ( bitter milk)  द्वारा प्राकृतिक फंगीसाइड दवा भी बना सकते हैं। जैविक फंगीसाइड दवा का प्रयोग करने पर लीफ कर्ल रोग बहुत जल्दी खत्म हो जाता है। 

लीफ माइनर रोग -
बेलदार सब्जियों पर इस रोग का अधिक प्रकोप होता है। पत्तियो पर सांप जैसी  आकृति बन जाती है। बाद में पत्तियां खराब हो जाती है। बीमारी का अधिक प्रकोप होने पर पत्तियों का आकार छोटा होता जाता है।

विल्ट ( म्लानि) रोग - 
करेले के पौधों पर लगने वाले इस रोग में पौधा मुरछाकर सूख जाता है।पौधे की पत्तियां पीली पड़ जाती हैं ।तने वाला क्षेत्र सिकुड़कर सूख जाता है । इस रोग में सबसे पहले पौधे की जड़ का भीतरी भाग सूख जाता है इस कारण पौधे की वृद्धि रुक जाती है। और फल- फूल आना बंद हो जाता है।

रोकथाम :- 
1- जहां पर आप ने करेले की फसल लगाई है उसके चारों तरफ साफ सफाई रखें । पानी इकट्ठा ना होने दें। खरपतवार निकाल दें क्योंकि गंदगी से यह रोग बहुत जल्दी फैलता है।
2- पौधों में कच्ची गोबर खाद का प्रयोग भूलकर भी ना करें क्योंकि कच्ची खाद के प्रयोग से यह रोग बहुत तेजी से फैलता है।
3- करेले के बीज को जमीन में लगाने से पहले वाबिस्टीन से बीज को संशोधित करें।

मिली बग रोग - 
यह सफेद रंग का चिपचिपा बहुत छोटा कीट होता है यह समूह में रहते हैं।और पौधे की पत्तियों पर चिपक कर अपने अन्डे छोड़ देते है। इनके ऊपर सफेद रंग का आवरण चढ़ा होता है। मिलीबग पौधे की पत्तियों से चिपक कर पौधे का रस चूसते रहते हैं जिससे पत्तियां सिकुड़ कर सूख जाती हैं।और आखिर में पौधा भी मर जाता है। मिलीबग का पौधे पर बहुत तेजी से प्रकोप होता है। अगर समय से इसका निदान नहीं किया गया तो यह जल्दी ही पूरी फसल को अपने आगोश में ले लेता है।

रोकथाम - 
1- 200 ग्राम नीम की पत्तियां
100- तीखी हरी मिर्च
50ग्राम - लहसून
1 लीटर गौमूत्र / WCD/  ताजा पानी
नीम की पत्तियां मिर्च और लहसुन को अच्छे तरीके से कूटकर चटनी बना लें। फिर इस चटनी को गोमूत्र में डालकर लगभग 10 मिनट हल्की आग पर उबालें। फिर इस मिश्रण को ठंडा कर छानकर पंप में भरकर रख लें ।मिलीबग का अटैक होने पर सप्ताह में दो बार इस मिश्रण का छिड़काव अपने पौधों पर करें जल्द ही मिलीबग आपके पौधे से खत्म हो जाएंगे।


करेले के फल पीली क्यों पड़ते है?
करेले की यह सबसे बड़ी समस्या है। करेले के फल छोटे होकर पीले पड़ जाते हैं। और बाद में सड़कर गिर जाते है।
कारण -
■ घटिया किस्म के बीज होने पर करेले के पौधे पर हमेशा छोटे साइज के फल आते है। आप पौधे में कितनी भी खाद पानी दें फल का साइज उतना ही रहेगा।  इसलिए अच्छी किस्म के बीजों से ही करेले को उगाएं।

■ लोग देसी बीज के नाम पर हाइब्रिड सब्जियों से बीज निकाल कर बेच देते है। इस तरह के बीजों से उगाए गए करेले के पौधे पर छोटे - छोटे करेले आते है। जो बहुत जल्दी पीले पड़कर पक जाते है। तो हमेशा असली देसी बीज से पौधे को उगाएं या हाइब्रिड किस्म के बीजों से पौधे को लगाएं। 

■ करेला गरमी और बरसात दोनों सीजन में उगाया जाता है। हम में से बहुत से लोग इस बात को नहीं जानते कि दोनों सीजन के लिए अलग अलग बीज होते है। लोग क्या करते है कि गरमी के सीजन वाले करेले के बीज बरसात में उगा देते है या बरसात वाले बीज गरमी में लगा देते है। गलत सीजन के बीज उगाने पर उनसे तैयार पौधों पर बेकार फल आते है। जो आकर में छोटे होते है और बहुत जल्दी पीले पड़कर पक जाते।

■ करेला एक बेलदार सब्जी है। इसे उगाने के लिए अधिक जगह की जरूरत होती है। आप में से अनेक लोग करेले को छोटे साइज के गमले में उगा देते है। करेले की मुख्य जड़ काफी गहराई में जाती है। जब करेले को छोटे गमले में लगा दिया जाता है तो करेले कि जड़ का पूरा विकास नहीं हो पाता । इस वजह से पौधे को जरूरी पोषक तत्व नहीं मिल पाते। इस वजह से भी करेले के फलों का साइज बड़ा नहीं होता और छोटे छोटे करेले पीले पड़ जाते है। हमेशा करेले को बड़े साइज के गमले में ही लगाएं।

करेला उगाने की पूरी जानकारी  करेला उगाने की पूरी जानकारी Reviewed by Garden advisor on अगस्त 16, 2020 Rating: 5

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